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Wholesale Price Inflation :भारत में WPI में भारी गिरावट थोक महंगाई दर -1.21% खाद्य पदार्थों की कीमतों में जनता को बड़ी राहत

Wholesale Price Inflation, भारत की थोक मूल्य सूचकांक (WPI) आधारित महँगाई दर अक्टूबर में गहरे नकारात्मक क्षेत्र में पहुँच गई है। सरकार द्वारा शुक्रवार को जारी किए गए आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार अक्टूबर में WPI महँगाई -1.21% पर रही, जो सितंबर के 0.13% से भी कम है। यह गिरावट न केवल महीने-दर-महीने बल्कि साल-दर-साल आधार पर भी ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है। पिछले वर्ष अक्टूबर 2024 में थोक महँगाई 2.75% पर थी, जिसके मुकाबले यह बड़ा संकुचन माना जा रहा है। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने इस तेज गिरावट का मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं, क्रूड ऑयल व प्राकृतिक गैस, बिजली, माइनरल ऑयल और बेसिक मेटल्स की कीमतों में आई कमी को बताया है। महीने-दर-महीने आधार पर WPI में -0.06% का परिवर्तन दर्ज किया गया।

GST सुधारों का प्रभाव: नई टैक्स संरचना ने महँगाई को खींचा नीचे

22 सितंबर से लागू हुई व्यापक GST दर सुधारों का असर अक्टूबर के पूरे महीने में दिखा। सरकार ने पिछले चार स्लैब वाले सिस्टम को सरल बनाकर सिर्फ दो प्रमुख स्लैब 5% और 18% में बदल दिया। कर दरों में इस कमी का असर सीधे थोक कीमतों पर दिखाई दिया, जिससे WPI के साथ-साथ खुदरा महँगाई (CPI) भी रिकॉर्ड स्तर पर नीचे आ गई।विशेषज्ञों के अनुसार टैक्स कटौती, अनुकूल बेस इफेक्ट और खाद्य आपूर्ति की बेहतर स्थिति ने महँगाई के दबाव को काफी हद तक कम किया है। इसके चलते अक्टूबर में महँगाई की दोनों प्रमुख श्रेणियां ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर दर्ज हुईं।

खाद्य कीमतों में बड़ी गिरावट, सब्जियाँ सबसे बड़ी वजह

अक्टूबर में खाद्य वस्तुओं में 8.31% की तीव्र डिफ्लेशन दर्ज की गई, जो सितंबर के 5.22% से कहीं अधिक है। सब्जियों के दामों में तो डिफ्लेशन 34.97% तक देखा गया — जो हाल के वर्षों में बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। सबसे तेज गिरावट वाली वस्तुएँ, प्याज: कीमतों में 65.43% की गिरावट, आलू: वर्ष-दर-वर्ष 39.88% सस्ता, और दालें (Pulses): 16.50% की गिरावट ,अधिक उत्पादन, पर्याप्त भंडारण और बेहतर वितरण प्रणाली ने खाद्य मूल्य सूचकांक को काफी नीचे धकेला।

RBI पर दबाव बढ़ा: दिसंबर में दर कटौती की उम्मीद मजबूत

इतने कम स्तर की थोक और खुदरा महँगाई ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) पर दरों में कटौती का दबाव बढ़ा दिया है। केंद्र बैंक ने अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.5% पर स्थिर रखा था, लेकिन घटती महँगाई को देखते हुए उसने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपनी महँगाई अनुमान को 3.1% से घटाकर 2.6% कर दिया है। यूनियन बैंक की चीफ इकोनॉमिक एडवाइज़र कनिका पासरीचा के अनुसार, वर्तमान तिमाही में महँगाई 0.5% पर है, जबकि RBI का अनुमान 1.8% का था। इस आकलन के बाद कई अर्थशास्त्री अब दिसंबर की बैठक में 25 बेसिस पॉइंट की दर कटौती की उम्मीद कर रहे हैं।

CPI भी ऐतिहासिक निचले स्तर पर, उपभोक्ताओं को राहत

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महँगाई अक्टूबर में गिरकर 0.25% पर आ गई, जो 2012 में शुरू हुई मौजूदा श्रृंखला के बाद से न्यूनतम स्तर है। खाद्य कीमतों में लगातार पाँचवें महीने गिरावट दर्ज की गई: अक्टूबर में खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति: -5.02% यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि आम उपभोक्ता को रोजमर्रा की वस्तुओं में उल्लेखनीय राहत मिल रही है। कई राज्यों में बेहतर मानसून, समय पर बुवाई, पर्याप्त जलाशय स्तर और सरकार के आरामदायक खाद्यान्न बफर स्टॉक्स ने इस परिस्थिति को और मजबूत बनाया है।

कृषि व उद्योग दोनों के लिए बेहतर संकेत

WPI में गिरावट केवल महँगाई में कमी का संकेत नहीं है, बल्कि यह उद्योगों के लिए भी राहत का माहौल बनाता है: कच्चे तेल और धातुओं की कीमतों में कमी से उत्पादन लागत घटती है। बिजली और ईंधन की कीमतों में नरमी से कंपनियों की ओवरऑल कॉस्ट कम होती है। खाद्य कीमतों में स्थिरता ग्रामीण मांग को बढ़ावा दे सकती है। यह परिदृश्य सरकार के लिए भी सकारात्मक है क्योंकि आगामी महीनों में कीमतों का नियंत्रण आर्थिक विकास को गति दे सकता है।

2025–26 के लिए महँगाई का आउटलुक बेहद अनुकूल

सभी प्रमुख संकेतक बताते हैं कि वित्त वर्ष 2025–26 में महँगाई का दबाव नियंत्रित रहने की संभावना है: अच्छा मानसून, रबी और खरीफ फसलों की मजबूत बुवाई, जलाशयों में पर्याप्त पानी, सरकारी बफर स्टॉक पर्याप्त और GST संरचना में सरलीकरण से टैक्स बोझ में कमी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो भारत 2025–26 में स्थिर कीमतों के साथ बेहतर आर्थिक वृद्धि का अनुभव कर सकता है।

निष्कर्ष: भारत में महँगाई नियंत्रण की दिशा में बड़ी उपलब्धि

अक्टूबर 2025 में भारत के लिए महँगाई के मोर्चे पर यह बड़ी राहत का महीना साबित हुआ है। थोक महँगाई का -1.21% तक गिरना, खाद्य कीमतों में रिकॉर्ड स्तर की कमी और खुदरा महँगाई का ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर पर आना देश की आर्थिक स्थिरता की ओर महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। सरकार के कर सुधार, अनुकूल मौसम और नियंत्रित आपूर्ति श्रृंखला ने मिलकर कीमतों को नीचे लाने में अहम भूमिका निभाई है। अब निगाहें RBI की दिसंबर बैठक पर टिकी हैं, जहाँ दर कटौती की संभावनाएँ अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुकी हैं।

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