IOCL Empolyees Unions ने IOC मैनेजमेंट द्वारा कर्मचारियों के अधिकारों का हनन, उनके साथ भेदभाव, प्राइवेटाइजेशन, कर्मचारियों की भर्ती पर रोक और E0 भर्ती जैसे मुद्दों को लेकर 7 अक्टूबर 2025 को IOC मैनेजमेंट के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आवाहन और समर्थन किया। जिससे घबराकर IOC मैनेजमेंट ने श्रम मंत्रालय से गुहार लगाकर आंदोलन को रोकने और मध्यस्थता बैठक करने के लिए राजी किया। अब 3अक्टूबर 2025 को दिल्ली में बैठक होंगी।
IOCL Employees Unions VS IOC मैनेजमेंट
भारत की सबसे बड़ी तेल विपणन कंपनी इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) में कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच विवाद गहराता जा रहा है। हालात इस कदर गंभीर हो गए हैं कि यूनियनों ने 7 अक्टूबर 2025 को देशव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी। इससे पहले ही केंद्र सरकार का श्रम एवं रोजगार मंत्रालय सक्रिय हो गया है और उसने सभी पक्षों को बातचीत की मेज पर बुलाने की तैयारी कर ली है।
क्यों उठी हड़ताल की नौबत?
IOCL के विभिन्न रिफाइनरी, पाइपलाइन और मार्केटिंग यूनिट्स से जुड़े यूनियनों का आरोप है कि कर्मचारियों से जुड़ी वेतन संशोधन, भत्तों की समीक्षा, पदोन्नति, सुरक्षा मानक और कल्याणकारी योजनाओं पर प्रबंधन लगातार टालमटोल कर रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि इन मुद्दों पर वर्षों से चर्चा हो रही है लेकिन ठोस कदम नहीं उठाए गए। यूनियनों ने आखिरकार 15 सितंबर 2025 को आधिकारिक हड़ताल नोटिस जारी कर दिया। इससे सरकार और IOCL प्रबंधन दोनों की चिंता बढ़ गई है।
श्रम मंत्रालय की मध्यस्थता क्यों ज़रूरी?
भारत में औद्योगिक विवादों को सुलझाने के लिए Industrial Disputes Act, 1947 में मध्यस्थता (Conciliation) की व्यवस्था है। इसी कानून के तहत श्रम मंत्रालय ने 3 अक्टूबर 2025 को एक अहम बैठक बुलाई है। यह बैठक नई दिल्ली के द्वारका स्थित श्रमेव जयते भवन में होगी और इसमें यूनियन नेताओं, IOCL प्रबंधन तथा सरकारी अधिकारियों की भागीदारी अनिवार्य है। उम्मीद की जा रही है कि इस सुलह प्रक्रिया से समाधान निकलेगा और देशव्यापी हड़ताल टल जाएगी।
अगर हड़ताल होती है तो क्या होगा?
IOCL भारत की सबसे बड़ी तेल और गैस आपूर्ति कंपनी है। इसके रुकते ही असर देशभर में तुरंत महसूस होगा।
1. पेट्रोल और डीज़ल की कमी
पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग सकती हैं और कई राज्यों में आपूर्ति बाधित हो सकती है।
2. LPG और घरेलू गैस संकट
रसोई गैस सिलेंडरों की कमी से आम घरों में समस्या बढ़ सकती है।
3. परिवहन और उद्योग पर असर
ट्रांसपोर्ट सेक्टर और कारखाने, जो IOCL के उत्पादों पर निर्भर हैं, ठप पड़ सकते हैं।
4. कीमतों में उछाल
ईंधन की कमी से काला बाज़ारी और कीमतों में अचानक उछाल देखने को मिल सकता है।
सरकार के सामने चुनौतियाँ
श्रम मंत्रालय ने वार्ता का रास्ता चुना है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है। विश्वास बहाल करना – कर्मचारियों का भरोसा तभी लौटेगा जब ठोस और लिखित आश्वासन दिए जाएंगे। वित्तीय दबाव – IOCL की मांगें पूरी करने के लिए भारी आर्थिक बोझ सरकार और कंपनी पर आ सकता है। राजनीतिक असर – विपक्ष और अन्य संगठन इस विवाद को बड़ा मुद्दा बना सकते हैं। जनता की उम्मीदें – आम लोगों को बिना परेशानी ईंधन आपूर्ति चाहिए, सरकार पर सीधा दबाव रहेगा।
संभावित समाधान क्या हो सकते हैं?
✓ अंतरिम समझौता – यूनियनों को कुछ मांगों पर तात्कालिक राहत, और बाकी पर आगे की तारीख तय की जा सकती है।
✓समिति का गठन – लंबित मुद्दों की समीक्षा के लिए एक संयुक्त समिति बनाई जा सकती है।
✓दीर्घकालिक सुधार – भविष्य में ऐसे विवाद न हों, इसके लिए नियमित संवाद और पारदर्शी नीति बनानी होगी।
हड़ताल का असर सबसे ज़्यादा आम आदमी पर पड़ता है। पेट्रोल पंपों की कतारें, रसोई गैस की किल्लत और महंगे दाम सीधे जनता की जेब पर चोट करते हैं। इसीलिए, हर कोई चाहता है कि 3 अक्टूबर की वार्ता सफल हो और हालात सामान्य रहें।
निष्कर्ष
IOCL की 7 अक्टूबर को प्रस्तावित हड़ताल सिर्फ कंपनी या कर्मचारियों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा विषय है। श्रम मंत्रालय की पहल सही दिशा में उठाया गया कदम है। अब देखना होगा कि क्या 3 अक्टूबर की बैठक में दोनों पक्ष सहमति पर पहुँचते हैं या फिर देश को एक बड़े ईंधन संकट का सामना करना पड़ेगा।
